कंगना की मणिकर्णिका या कंगना की मनु

By Parveen Kumar
Last modified 19 Feb 2019


मणिकर्णिका झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई की जीवनी पर बनी फिल्म है! काफी वाह वाही भी हुई! कंगना का काम शानदार रहा ! पर पूरी फिल्म एक बात जो सबसे जायदा खटकी हो था पुरे ढाई घंटे कैमरा सिर्फ कगना पर था उसके किरदार को शानदार बनाने के चक्कर में बाकि के किरदारों को बिलकुल गौण कर दिया गया है!

ऐसा लगता है की डायरेक्टर ने थोड़ी बुहत भी रिसर्च नहीं की फिल्म बनाने से पहले, छठी या सातवीं कक्षा में जो पाठ हुआ करता था! उसी को पढ़ा और फिल्म बना दी!

यंहा तक की युद्ध के दौरान भी सिर्फ कगना ही दिखाई देती थी और कोई नहीं!

जब दामोदर के गोद लिए जाने को अंग्रेज़ों ने अवैध घोषित कर दिया तो रानी लक्ष्मीबाई को झाँसी का अपना महल छोड़ना पड़ा था! उन्होंने एक तीन मंज़िल की साधारण सी हवेली 'रानी महल' में शरण ली थी! रानी ने वकील जॉन लैंग की सेवाएं लीं जिसने हाल ही में ब्रिटिश सरकार के खिलाफ़ एक केस जीता था!

झांसी को बचाने के लिए रानी लक्ष्मीबाई ने बागियों की फौज तैयार करने का फैसला किया था! उन्हें गुलाम गौस ख़ान, दोस्त ख़ान, खुदा बख्‍़श, सुंदर-मुंदर, काशी बाई, लाला भऊ बख्‍़शी, मोती भाई, दीवान रघुनाथ सिंह और दीवान जवाहर सिंह से मदद मिली! 1857 की बगावत ने अंग्रेजों का फोकस बदला और झांसी में रानी ने 14000 बागियों की सेना तैयार की!

झलकारी बाई,सुंदरी-मुंदरी, काशीबाई, लाल भाऊ बक्शी, दीवान रघुनाथ सिंह आदि, गुलाम गौंस खान का किरदार ठीक दिखाया गया है। झलकारी बाई का किरदार कोई खास नही दिखाया गया जबकि वो रानी की खास सलाहकार ओर प्रमुखों में से एक थी। सुंदर मुंदर दोनों बहनें थी। जब अंग्रेज सेना किले के अंदर घुस गई तो जिस महिला टुकड़ी नेत्रत्व भी दोनों बहनों ने किया था। जिस वजह अंग्रेज सेना समझ ही नही पायी की ये सेना तो अनुमान से ज्यादा है। कहते है दिन ढलते ढलते अंग्रेज सेना को पता चल गया कि ये सेना एक महिला टुकड़ी है।

फ़िल्म में ऐसे बहुत अच्छी तरह फिल्माया जा सकता था पर शायद कुछ व्यवयसिक कारणों से नही किया गया। वेसे भी ढाई घण्टे की फ़िल्म में कितना कुछ दिखाया जा सकता है।

बहरहाल फ़िल्म ठीक है। एक बार देखने लायक है।

1858 में सिंधिया राजवंश के खजांची अमरचन्द्र बाठिया का नाम उन अमर शहीदों में लिया जाता है, जिन्होंने अपनी जांन की परवाह न करते हुए भी रानी की मदद की। इतिहासकार बताते हैं कि अमरचन्द्र बाठिया ने सबसे बगावत करते हुए सिंधिया राजकोष का धन रानी को मदद के रूप में दिया था। जिसके कारण उनके उपर एक अंग्रेजों द्वारा मुकदमा भी चलाया गया था और उन्हें एक पेड़ पर लटकाकर फांसी दे दी गई। शहर के सराफा बाजार में स्थित ये पेड़ आज भी अमरचंद्र बांठिया और रानी की शहादत का प्रतीक है।

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