नैनीताल की सैर - Part 3

By kartikey tripathi
Last modified 22 Nov 2018

नैनीताल की सैर भाग 3

मैं वही पत्थरों पे बैठ गया और सोचा फिर तो मेरा नैनीताल आना ही बेकार हो जायेगा | वैसे भी प्यार का जूनून हर चीज पे भारी पड़ता है बोतल से एक घूँट पानी पिया और दृढनिशचय के साथ उठा तो कदम अपने आप चलने लगे| रास्ता एक पहाड़ी पगडंडी थी जो लोगो के पैदल चलने से बनी थी रास्ते में पेड़ो से गिरे हुए सूखे लाल पीले पत्तो की कई परते बिछी हुयी थी रास्ता बहुत ही खूबसूरत था बहुत घना जंगल था पेड़ो से टकराकर सूरज की किरणे बमुश्किल जमीन पर पड रही थी वातावरण बहुत ही शांत और सुरम्य था कही से कोई इंसानी आवाज का शोरगुल नहीं था बैठकर अपनी धड़कनो की आवाज सुनी जा सकती थी आसपास से सिर्फ पेड़ो, जीवजन्तुओ की आवाजों का संगीत था, कभी कभी किसी बिल्ली या किसी जानवर की पेड़ो पर उछलकूद करने की आवाज अंदर तक डरा जाती थी मैं पहली बार ऐसी जगह पर था की अचानक एक अजीब सी आवाज ने मुझे डरा दिया की कही वाघ तो नही आ गया, एक बार मैंने अपने प्रेमिका से इस जगह जाने का जिक्र किया था तो उसने मजाक में कहा था की अकेले मत जाना तुम्हे वाघ खा जायेगा, सहसा यही बात याद आ गई खैर आसपास देखा तो कोई न दिखा मोबाईल पे नजर गयी तो नेटवर्क का नामोनिशान नहीं था मै डर से निजात पाकर पथरीली पगडंडी पे आगे बढ़ने लगा| आगे जाने पर उसी रस्ते में से दो रस्ते बन गए अब मै कन्फ्यूज था की कोण से रास्ते से जाऊ अगर गलत रस्ते पे भटक गया तो वापस भी आ पाउगा या नहीं पता नही अब तो मुझे जंगल में भटक जाने वाले यात्रियों की कहानिया याद् आने लगी वही पर आराम से जमीं पर बैठ गया और बचा हुआ एक घूंट पानी पिया|

Beautifull scenary of Nainital
एक नजर उठा कर ऊपर देखा तो मेरी उम्मीद की किरण दिख गयी ऊपर से बिजली की लाइन गुजर रही थी तो उसी बिजली की लाइन मार्गदर्शक मान आगे बढ़ने लगा अब तक बहुत जोरो की भूख लग चुकी थी और में उस पुरे रास्ते में अकेला प्राणी था जो भटक रहा था कही से भी इंसानी आवागमन नहीं हो रहा था
पेड़ पौधे और हजारो तरह के जीवो की आवाजे ही मेरे साथी थे लेकिन ऊपर के नजारे अब और भी खूबसूरत थे क्युकी हिमालय की चोटियों को वहां से नंगी आँखों से साफ देखा जा सकता था, अविस्मरणीय नजारा था कही कही पर रस्ते में बडे बड़े पत्थर मिले जिनके ऊपर चढ़कर मै हिमालय की चोटियों को देख रहा था जो उत्तर दिशा में दिख रही थी उस जगह कुदरत अपने सोलह सिंगार में नजर आ रही थी चलते चलते मै अपनी मंजिल के करीब था अब मुझे वहा पर कुछ नजर आ रहा था जो वायरलेस रिपीटर स्टेशन था जो 8622 फिट की ऊंचाई पर स्थित था मै वहा पहुंच कर कंक्रीट के बने हुए चबूतरे पर अपना बैग एक साइड फेंक कर लेट गया|
बहुत ख़ुशी का क्षण था वो 5 मिनट लेटने के बाद मैंने देखा की यहां खाने की जुगाड़ भी है तुरंत वहा से बिस्कुट और पानी लिये और खाने के बाद जान में जान आयी फिर मैगी का ऑर्डर दिया और खाया तो 8622 फिट ऊंचाई पर खाने का मजा ही कुछ और था अब पेट भर चूका था|
उस वायरलेस रिपीटर स्टेशन में संदेश आ जा रहे थे पुरे कुमांयु मंडल के मेसेज का आदान प्रदान हो रहा था वो कमरा नुमा एक टीनशेड था जिसमे रात में भी एक कर्मचारी ठहरता था तो मैंने उससे बातचीत शुरू कर दी की यहां पर वाघ भी आते है उसने बताया दिन में नही लेकिन कभी कंही रात में जरूर आते है| काफी ऊँचे ऊँचे आसपास पेड थे शायद चीड़ और देवदार के पेड़ थे फिर उठ कर आसपास के नजारे देखने लगा तो जैसे मेरी मेहनत सफल हो गयी इतने खूबसूरत जगह को देखकर| वायरलेस स्टेशन के ठीक सामने एक छोटा सा मंदिर है चीना बाबा का शायद इन्ही के नाम से इस पहाड़ी का नाम चीना पीक पड़ा होगा|
फिर मैंने उस कर्मचारी से उस जगह के बारे में पूछा जहा से पुरे नैनीताल शहर का अद्भुत नजारा दीखता है तो बताया की मुझे अभी 200 मीटर बढ़ना होगा मै फिर से बढ़ चला इस चीड़ के पेड़ो के बीच पगडंडी से चलता हुआ में उस जगह पे पहुंच गया जहा से पूरी नैनीझील आम के आकर में दिखती है और उसके झील के आसपास पूरा नैनीताल शहर बसा हुआ है सिर्फ इसी नजारे को देखने के लिए लोग इतनी ऊंचाई पे जाते है| इस व्यू पॉइंट से खुर्पाताल झील भी नजर आ रही थी और नैनीताल का ग्राउंड भी स्पस्ट दिखाई दे रहा था |

रास्ते से दिखती झील एक फ्रेम मेंथक हारकर आखिरकार मैं अपनी मन्जिल के करीब था
सूरज की धुप में बड़ी तेज चमक थी लेकिन गर्मी का अहसास नहीं था ज्यादा चमक की वजह से मुझे मोबाईल की स्क्रीन पर कुछ भी नजर नहीं आ रहा था और फोटो भी लेने में परेशानी हो रही थी| इस जगह से नैनीताल के जाने माने फोटोग्राफर जैसे श्री अमित शाह जी और कुबेर सिंह डंगवाल जी बहुत ही खूबसुरत फोटो लेते रहते है, ये लोग रात के समय आसमान की खूबसूरती को भी यहाँ से कैमरे में कैद करते है|
इस चोटी के टॉप पर बैठने की पर्याप्त जगह है तथा बिलकुल किनारे पर रेलिंग लगी हुयी थी जिसे शरारती तत्वों ने तोड़ डाला था और पत्थरो पर सैकड़ो प्रेमी प्रेमिकाओं के नाम लिखे हुए थे और मैंने भी उस जगह अपने नाम लिख डाले फिर सोचा अपनी प्रेमिका की पसंदीदा जगह से उसे फोन किया जाये मगर अफसोस नेटवर्क नही था, इस जगह पर मैंने लगभग दो घंटे बिताये फिर सोचा अगर कही रस्ते में मौसम खराब हुआ तो यह सर छुपाने की जगह भी नहीं है तो समय रहते वापस चल दिया और लगभग डेढ़ घंटे में मै निचे उतर आया|

जारी है.........

 

4 comment(s).
Guest User



A very nice story on a very beautiful city Nainital. Great..
Reply  Cancle

You story is very interesting.you have explained very well and you story is encouraging to others to visit Nainital.
Reply  Cancle

बहुत बढ़िया। बहुत ही अच्छा लिखा है आपने।हर एक चीज को बारीकी से बताया है।
Reply  Cancle

Very nicely written. Good story.all three parts are interesting.
Reply  Cancle

 
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